लखनऊ: उत्तर प्रदेश में गंगा नदी को अतिक्रमण मुक्त बनाने और भविष्य में बाढ़ के ख़तरे को कम करने के लिए योगी सरकार ने कमर कस ली है। सरकार ने गंगा के 'फ्लड प्लेन' (बाढ़ क्षेत्र) की भौतिक सीमा तय करने के लिए 31 मार्च 2026 तक की समयसीमा निर्धारित की है। इस महापरियोजना के तहत प्रदेश के 13 ज़िलों में गंगा के किनारों पर कुल 7,350 पिलर (सीमांकन स्तंभ) लगाए जाएंगे।
2025 में बदलाव सिर्फ़ योजनाओं से नहीं आया। वह तब मज़बूत हुआ, जब लोगों ने कहा कि हमारी गंदगी, हमारी ज़िम्मेदारी।₹1347 करोड़ के नए प्रोजेक्ट्स के साथ,मोतिहारी से कटिहार तक,शहरों ने मिलकर यह तय किया किगंगा तक जाने वाला पानीअब बिना सफ़ाई के नहीं जाएगा।ये सिर्फ़ सिस्टम का… pic.twitter.com/KEtJYK4JVF
— Namami Gange (@cleanganganmcg) December 18, 2025
उन्नाव से बलिया तक 'सफ़ेद स्तंभों' का घेरा
सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, इस अभियान का मुख्य केंद्र सेगमेंट-बी, फेज-II है, जो उन्नाव से शुरू होकर बलिया तक लगभग 710 किलोमीटर की लंबाई में फैला है।
चिह्नित ज़िले: कानपुर नगर, उन्नाव, रायबरेली, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशाम्बी, प्रयागराज, भदोही, मिर्ज़ापुर, वाराणसी, चंदौली, ग़ाज़ीपुर और बलिया।
तकनीकी आधार: पिलर लगाने के लिए 100 साल में आई सबसे बड़ी बाढ़ (1:100 year flood return period) के आंकड़ों और 1 मीटर कंटूर लाइन को आधार बनाया गया है।
क्यों ज़रूरी है यह सीमांकन?
गंगा के मैदानी इलाक़ों में अनियंत्रित निर्माण और अतिक्रमण के कारण नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है। पिलर लग जाने के बाद:
निर्माण पर प्रतिबंध: इन स्तंभों के अंदर किसी भी प्रकार का पक्का निर्माण, आवासीय कॉलोनी या व्यावसायिक गतिविधि पूरी तरह प्रतिबंधित होगी।
नक्शा पास होना बंद: विकास प्राधिकरण पिलर के भीतर आने वाली जमीनों का नक्शा पास नहीं करेंगे।
पारिस्थितिकी की सुरक्षा: नदी के पास की भूमि (Buffer Zone) को केवल कृषि या वृक्षारोपण के लिए सुरक्षित रखा जा सकेगा, जिससे भूजल पुनर्भरण (Groundwater recharge) में मदद मिलेगी।
आधुनिक तकनीक का सहारा
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सीमांकन का कार्य केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर सटीक रूप से करने के लिए सर्वे ऑफ इंडिया और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (NIH), रुड़की की मदद ली जा रही है।
ड्रोन सर्वे: दुर्गम इलाक़ों और नदी के कछार क्षेत्रों में सटीक अक्षांश (Latitude) और देशांतर (Longitude) प्राप्त करने के लिए ड्रोन का उपयोग किया जा रहा है।
डिजिटल मैपिंग: सभी 7,350 पिलरों की लोकेशन को डिजिटल मैप पर अंकित किया जाएगा ताकि भविष्य में कोई भी उन्हें हटा या बदल न सके।
"नदी की ज़मीन नदी की ही रहनी चाहिए। यह पिलर न केवल बाढ़ से लोगों की जान-माल की रक्षा करेंगे, बल्कि गंगा की अविरलता और निर्मलता को बनाए रखने में मील का पत्थर साबित होंगे।"
— सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता की रिपोर्ट का अंश
आगे की राह: सहायक नदियों पर भी नज़र
गंगा के साथ-साथ उसकी सहायक नदियों—वरुणा और अस्सी (वाराणसी) तथा यमुना के तटों पर भी इसी तरह के सीमांकन कार्य को तेज करने के निर्देश दिए गए हैं। गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) में यमुना के किनारों पर पहले ही 254 पिलर लगाए जा चुके हैं।
नागरिकों के लिए सूचना: यदि आप नदी किनारे जमीन खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो सुनिश्चित करें कि वह ज़मीन 'नो डेवलपमेंट ज़ोन' या प्रस्तावित पिलर सीमा के भीतर न आती हो।