GTC News: भारत आज जिस तेज़ी से आर्थिक और सामाजिक बदलावों से गुज़र रहा है, उसी तेजी से एक और बदलाव चुपचाप हमारे जीवन में घर कर चुका है- दिल की बीमारियों का बढ़ता ख़तरा। कभी अमीर देशों की बीमारी मानी जाने वाली हृदय रोग की बीमारियां आज भारत में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। यह केवल बुज़ुर्गों की समस्या नहीं रह गई, बल्कि युवा आबादी भी इसकी चपेट में आ रही है।
दिल के दौरे, स्ट्रोक से लाखों लोगों ने गंवाई जान
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में होने वाली मौतों में हृदय रोगों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है, और भारत इसका बड़ा हिस्सा वहन करता है। देश में हर साल लाखों लोग दिल के दौरे, स्ट्रोक और अन्य हृदय संबंधी जटिलताओं के कारण जान गंवाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीयों में हृदय रोग अपेक्षाकृत कम उम्र में और अधिक गंभीर रूप में देखने को मिलते हैं। 30-40 वर्ष की आयु के युवाओं में हार्ट अटैक के मामले बढ़ना समाज के लिए गंभीर चेतावनी है।

सरकारी पहल और चुनौतियाँ
भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए कार्यक्रम शुरू किए हैं। आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ गंभीर रोगों के उपचार में आर्थिक सहायता प्रदान करती हैं। इसके अलावा, Indian Council of Medical Research (ICMR) समय-समय पर शोध और दिशा-निर्देश जारी करता है, जो नीति-निर्माण में सहायक होते हैं। फिर भी चुनौतियाँ बरकरार हैं—ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, जागरूकता का अभाव, नियमित स्वास्थ्य जांच की अनदेखी, और प्राथमिक स्तर पर स्क्रीनिंग की अपर्याप्त व्यवस्था।

समाधान की दिशा
निष्कर्ष: भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी ताकत है। यदि यह आबादी अस्वस्थ जीवनशैली के कारण हृदय रोगों की गिरफ्त में आती रही, तो इसका असर देश की उत्पादकता और विकास पर पड़ेगा। दिल की सेहत केवल व्यक्तिगत चिंता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। समय आ गया है कि हम “इलाज” से आगे बढ़कर “रोकथाम” की सोच अपनाएँ। स्वस्थ दिल ही स्वस्थ भारत की नींव है।