Friday, 9th of October 2026

आज ही के दिन महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने दुनिया को हमेशा के लिए कह दिया था 'अलविदा'

Edited By: Mohd Juber Khan | Updated at:
आज ही के दिन महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने दुनिया को हमेशा के लिए कह दिया था 'अलविदा'

आज ही के दिन महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने दुनिया को हमेशा के लिए कह दिया था 'अलविदा'

GTC News: "हर एक बात पे कहते हो तुम कि 'तू क्या है' तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।" बेशक़ महान अदीब और शायर मिर्ज़ा ग़ालिब भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनकी मौजूदगी आज भी कहीं ना कहीं जब-तब दस्तक देती रहती है। भारतीय उपमहाद्वीप में जब कभी उर्दू-फ़ारसी शायरी का ज़िक्र होता है, तो यह लाज़िमी है कि ग़ालिब की चर्चा भी उस महफ़िल में क़ायदे से की जाती है। शायरी के अंदाज़े-बयां का जो सलीक़ा ग़ालिब के पास था, उसकी नज़ीर कहीं नहीं मिलती। 

मिर्ज़ा ग़ालिब की पैदाइश और मौत

आगरे (उत्तर प्रदेश) में आज ही के दिन 1797 में जन्में मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग़ ख़ां उर्फ़ 'ग़ालिब' ने 15 फ़रवरी 1869 को दिल्ली में इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।

मिर्ज़ा नौशा को अगर क़ायदे से याद किया जाए तो उनके शेर, बेहतरीन नज़्म, फ़ारसी पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ , मज़ाकिया अंदाज़ और लहजा, बेलौस और उधारी की मारी हुई ज़िंदगी, आम से मोहब्बत, शराब से सोहबत, जुए की लत, डोमनी से इश्क़बाज़ी और न जाने क्या-क्या याद आ जाता है। शायरी के अलावा एक और बात जो उन्हें 'गालिब' बनाती है वो है उनके खत़। इतिहासकारों का मानना है कि अगर ग़ालिब ने शायरी न भी की होती तो उनके खत़ उन्हें अपने दौर का सबसे ज़हीन इंसान बना देते। दरअसल उन्हें चिट्ठियां लिखने का बेहद शौक़ था। 

ग़ालिब का हरियाणा से था ये संबंध

मिर्ज़ा ग़ालिब, मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे। ये कम लोग ही जानते हैं कि आगरा, दिल्ली और कलकत्ता में अपनी ज़्यादातर जिंदगी गुज़ारने वाले ग़ालिब का ताल्लुक़ हरियाणा से भी था। असल में मिर्ज़ा ग़ालिब की ससुराल फिरोज़पुर झिरका/लोहारु (मेवात) में थी। गौरतलब है कि मिर्ज़ा ग़ालिब ने लोहारु के नवाब इलाही बख़्स की बेटी उमराव बेग़म के साथ निकाह किया था। नवाब इलाही बख़्श 'मारूफ़' का संबंध फिरोज़पुर झिरका और लोहारु (हरियाणा) के शाही परिवार से था, जो मेवात क्षेत्र में उस ज़माने की अहम रियासतें थी। बहरहाल, शादी के बाद मिर्ज़ा नौशा अपनी तक़्दीर की इबारत लिखने के लिए दिल्ली के बल्लीमारान आ गए थे। 

मजे़दार बात ये है कि ग़ालिब की मौत के बाद जब उनकी पत्नी उमराव मिर्ज़ा की मौत हुई, तो उस दौर में बेग़म उमराव की पेंशन फिरोजपुर झिरका रियासत से ही मिलती थी। हालाकि बाद में अंग्रेज़ों ने उनकी पेंशन बंद कर दी थी।

"रग़ों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं कायल,

जब आँख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है"

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