Thursday, 5th of February 2026

बांके बिहारी मंदिर में सलीम को रेलिंग ठेका देने से नाराज़ संतों ने योगी को लिखा पत्र

Reported by: GTC News Desk  |  Edited by: Mohd Juber Khan  |  February 04th 2026 06:12 PM  |  Updated: February 04th 2026 06:12 PM
बांके बिहारी मंदिर में सलीम को रेलिंग ठेका देने से नाराज़ संतों ने योगी को लिखा पत्र

बांके बिहारी मंदिर में सलीम को रेलिंग ठेका देने से नाराज़ संतों ने योगी को लिखा पत्र

मथुरा/वृंदावन: विश्व प्रसिद्ध ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में भीड़ नियंत्रण के लिए लगाई जा रही स्टील रेलिंग के ठेके को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। असल में विवाद की मुख्य वजह मेरठ की एक फ़र्म 'कनिका कंस्ट्रक्शन' को यह काम सौंपा जाना है, जिसके मुख्य पार्टनर सलीम अहमद (सलीम खान) बताए जा रहे हैं। इस ख़बर के सामने आते ही ब्रज के साधु-संतों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है और मामले की शिकायत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंच गई है।

"मंदिर प्रांगण में हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं"

श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश फलाहारी महाराज ने इस संबंध में मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर ठेका तत्काल निरस्त करने की मांग की है। संतों का तर्क है कि सनातन समाज में हज़ारों कुशल हिंदू ठेकेदार मौजूद हैं, फ़िर मंदिर के कार्यों के लिए गैर-हिंदू फर्म को क्यों चुना गया? यही नहीं आरोप ये भी लगाया गया है कि ठेकेदार ने अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर ठेका हासिल किया है। पत्र में चेतावनी दी गई है कि मंदिर परिसर के एक किलोमीटर के दायरे में 'सनातन विरोधियों' का प्रवेश ब्रजवासियों को किसी भी क़ीमत पर मंज़ूर नहीं है।

"नाम छिपाया नहीं, यह भगवान की कृपा है"

विवाद गहराने पर ठेकेदार सलीम अहमद ने मीडिया के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि फ़र्म का नाम 'कनिका' उनके एक पुराने हिंदू पार्टनर की बेटी के नाम पर रखा गया था, जो पिछले 15 सालों से इसी नाम से रजिस्टर्ड है। ठेकेदार सलीम ने ज़ोर देते हुए बताया कि इस काम में उनके साथ हिंदू पार्टनर रंजन शर्मा शामिल हैं और साइट पर सारा काम वही देख रहे हैं। सलीम का दावा है कि उन्होंने आईआईटी रुड़की की टीम के सामने 'स्लाइडिंग एंड फोल्डिंग' तकनीक का प्रेजेंटेशन दिया था, जिसके बाद उनकी क़ाबीलियत को देखते हुए उन्हें यह प्रोजेक्ट मिला। उन्होंने इसे 'बांके बिहारी की कृपा' बताया।

क्या कह रहा है स्थानीय प्रशासन?

विवाद बढ़ने पर प्रशासन और मंदिर प्रबंधन की ओर से भी स्पष्टीकरण सामने आया है। एडीएम (फाइनेंस) पंकज वर्मा ने बताया कि यह प्रोजेक्ट सीधे तौर पर सरकारी बजट से नहीं, बल्कि उन बैंकों के CSR (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) फंड से वित्तपोषित है, जहां मंदिर का खाता है। प्रशासन का ये भी मानना है कि बैंकों ने भीड़ प्रबंधन के लिए हाई-टेक रेलिंग का प्रस्ताव दिया था और मानक प्रक्रिया के तहत कनिका कंस्ट्रक्शन का चयन किया गया। वहीं प्रशासन ने पहचान छिपाने के इल्ज़ामों को पूरी तरह से निराधार बताया है।

क्यों ये रेलिंग साधारण रेलिंग नहीं हैं?

यह कोई साधारण रेलिंग नहीं है। मंदिर के कॉरिडोर और प्रांगण में लगभग 21,000 किलोग्राम वज़न की मज़बूत स्टील रेलिंग लगाई जा रही है। इसकी मुख्य ख़ासियत हाइड्रोलिक पिस्टन और स्लाइडिंग तकनीक है, जिससे ज़रूरत पड़ने पर कुछ ही मिनटों में रेलिंग की दिशा बदली जा सकती है या उसे हटाया जा सकता है। अब तक इस प्रोजेक्ट पर क़रीब 50 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है।

बहरहाल, फ़िलहाल यह मामला धार्मिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां एक तरफ़ संत समाज इसे आस्था पर प्रहार बता रहा है, वहीं दूसरी ओर मंदिर के कुछ सेवायतों का मानना है कि निर्माण कार्यों में शिल्पकारों की कला देखी जानी चाहिए, धर्म नहीं। अब सबकी नज़रें मुख्यमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप पर टिकी हैं,क्योंकि अभी तक सीएमओ उत्तर प्रदेश की तरफ से पत्र का जवाब नहीं आया है।

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