Wednesday, 4th of February 2026

भारत पर अमेरिकी टैरिफ़ 50 से घटकर 18 फ़ीसदी होगा, लेकिन क्या आड़े आ रहा है 'रूसी तेल'

Reported by: GTC News Desk  |  Edited by: Mohd Juber Khan  |  February 03rd 2026 01:39 PM  |  Updated: February 03rd 2026 01:42 PM
भारत पर अमेरिकी टैरिफ़ 50 से घटकर 18 फ़ीसदी होगा, लेकिन क्या आड़े आ रहा है 'रूसी तेल'

भारत पर अमेरिकी टैरिफ़ 50 से घटकर 18 फ़ीसदी होगा, लेकिन क्या आड़े आ रहा है 'रूसी तेल'

वाशिंगटन/नई दिल्ली: 2 फ़रवरी 2026 की आधी रात, दुनिया के दो अहम देशों के लिए ऐतिहासिक साबित हुई। दरअसल बीती आधी रात को जब विश्व की सबसे पुरानी डेमोक्रेसी यानी संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के X प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए ये संदेश दिया गया कि टैरिफ़ को लेकर दुनिया के दो महत्वपूर्ण देशों के बीच आपसी सहमति बन गई है, तो ये महज़ दो बड़े देशों की बीच की आपसी व्यापारिक रज़ामंदी ही नहीं थी, बल्कि इससे दुनियाभर ये संदेश भी साफ़तौर पर चला गया कि भारत और अमेरिका के कूटनीतिक संबंध पहले से ज़्यादा मज़बूत और प्रभावी बन चुके हैं।

इस महत्वपूर्ण के डील के बाद कहा जा सकता है कि भारत और अमेरिका के क़रीब एक साल से चले आ रहे व्यापारिक तनाव पर भी पूर्ण विराम लग चुका है। गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामानों पर आयात शुल्क (Tarrifs) को 50 प्रतिशक से घटाकर 18 फ़ीसदी करने का बड़ा ऐलान कर दिया है। जानकारी के मुताबिक़ इस फ़ैसले को राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई एक महत्वपूर्ण टेलीफ़ोनिक बातचीत के ज़रिए अमलीजामा पहनाया गया। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों के बक़ौल, यह समझौता न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि वैश्विक भू-राजनीति के लिए भी अहम माना जा रहा है। यही नहीं जानकारों का ये भी दावा है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में भी ये डील निर्णायक साबित हो सकती है।

भारत-अमेरिका समझौता के अहम बिंदु:

अमेरिका अब भारतीय उत्पादों पर महज़ 18% 'पारस्परिक' टैरिफ़ लगाएगा।

अमेरिका ने वह 25% अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क (Punitive Tariff) वापस ले लिया है, जो भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद जारी रखने की वजह से लगाया गया था। अब इस घटाकर 18 फ़ीसदी कर दिया गया है।

भारत ने अमेरिकी उत्पादों पर व्यापार बाधाओं और शुल्कों को घटाकर 'शून्य' करने की दिशा में क़दम उठाने का विश्वास जताया है।

रूस से दूरी और अमेरिका से नज़दीकी के संकेत

भारत-अमेरिकी के व्यापारिक रिश्तों से इतर अब भारत की विदेश नीति को लेकर भी मीडिया हलकों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, जो कि स्वाभाविक हैं। असल में इस डील की सबसे बड़ी शर्त भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद बंद करना भी माना जा रहा है, जिसे लेकर भारतीय विदेश नीति के जानकार अभी कुछ भी कहने से बच रहे हैं। 

बहरहाल अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुताबिक़, "आज सुबह भारत के पीएम मोदी से बात करना मेरे लिए सम्मान की बात थी, वह मेरे सबसे अच्छे मित्रों में से एक हैं और अपने देश के एक शक्तिशाली और सम्मानित नेता हैं, हमने कई विषयों पर चर्चा की, जिनमें व्यापार और रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करना भी शामिल था, उन्होंने रूसी तेल की खरीद बंद करने, अमेरिका से और संभवत, वेनेज़ुएला से, कहीं अधिक तेल खरीदने पर सहमति जताई, इससे यूक्रेन में चल रहे युद्ध को समाप्त करने में मदद मिलेगी, जिसमें हर हफ़्ते हजारों लोग मारे जा रहे हैं, प्रधानमंत्री मोदी के प्रति मित्रता और सम्मान के चलते और उनके आग्रह पर तत्काल प्रभाव से हमने अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापार समझौते पर सहमति जताई है, इसके तहत अमेरिका ने रेसिप्रोकल टैरिफ़ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है, भारत भी अमेरिका के प्रति अपने टैरिफ़ और नॉन टैरिफ़ बैरियर्स को ज़ीरो करने की दिशा में आगे बढ़ेगा, प्रधानमंत्री ने "बाय अमेरिकन" नीति के तहत अमेरिका से और अधिक ख़रीदारी करने की प्रतिबद्धता भी जताई है, इसमें 500 अरब डॉलर से ज़्यादा की अमेरिकी ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, कृषि, कोयला और अन्य कई उत्पादों की ख़रीद की जाएगी, भारत के साथ हमारा शानदार रिश्ता आने वाले समय में और भी मज़बूत होगा, प्रधानमंत्री मोदी और मैं ऐसे व्यक्ति हैं जो काम को अंजाम तक पहुंचाते हैं, जबकि ज़्यादातर के बारे में ये बात नहीं कही जा सकती।"

ऐसे में भारत अब अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए रूसी आपूर्ति के बजाय अमेरिकी तेल, गैस और कोयले पर निर्भरता बढ़ाएगा। यही नहीं, डोनाल्ड ट्रंप ने ये भी दावा किया कि भारत $500 बिलियन से ज़्यादा के अमेरिकी ऊर्जा, तकनीक और कृषि उत्पादों की खरीद करेगा।

अमेरिकी डील का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत-अमेरिका की इस व्यापारिक घोषणा के बाद भारतीय बाज़ार और उद्योग जगत में ख़ुशी देखी जा रही है। औद्योगिक क्षेत्र ये मानकर चल रहा है कि इस डील के बाद यक़ीनन भारतीय निर्यात को मज़बूती मिलेगी। ख़ासतौर पर इंजीनियरिंग सामान, ऑटो पार्ट्स, टेक्सटाइल और रत्नों जैसे महत्वपूर्ण निर्यात क्षेत्रों को इस कटौती से सीधे तौर पर फ़ायदा होगा।

इस डील का ही असर है कि भारतीय शेयर बाज़ारों (Nifty और Sensex) में ज़ोरदार उछाल देखा जा रहा है।

कुल-मिलाकर, प्रधानमंत्री मोदी ने इस क़दम का स्वागत करते हुए 'X' पर राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद दिया और कहा, "आज मेरे प्रिय मित्र राष्ट्रपति ट्रंप से बात करके बेहद ख़ुशी हुई, यह जानकर ख़ुश हूं कि अब 'मेड इन इंडिया' उत्पादों पर टैरिफ' घटाकर 18% कर दिया गया है, इस घोषणा के लिए भारत के 1.4 अरब लोगों की तरफ़ से राष्ट्रपति ट्रंप का शुक्रिया, जब दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र साथ मिलकर काम करते हैं, तो इसका लाभ हमारे लोगों को मिलता है और परस्पर हित के अपार अवसर खुलते हैं, वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए राष्ट्रपति ट्रंप का नेतृत्व बेहद महत्वपूर्ण है, शांति के प्रयासों में भारत उनके साथ पूरी मज़बूती से खड़ा है, मैं उनके साथ मिलकर अपनी साझेदारी को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए तैयार हूं।"

क्या ट्रंप की घोषणा से संवरेगा भारत का भविष्य?

ये जगज़ाहिर है कि अमरीकी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री की पोस्ट न केवल अमेरिका और भारत में चर्चा का विषय बनी हुई हैं, बल्कि दुनियाभर के कूटनीतिक जानकारों की नज़रें भी दुनिया के दो बड़े राष्ट्राध्यक्षों के एक-एक शब्द की बारीकी से जांच-परख कर रही हैं। वैसे अगर बात की जाए भारत की, तो यहां भी मीडिया हलकों से लेकर सियासी गलियारों तक इस के बारे में ज़ोर-शोर से विचार-विमर्श या चिंतन-मनन किया जा रहा है। अब हर भारतीय ये जानने की जद्दोजहद कर रहा है कि आख़िर इस डील से भारत के लिए क्या फ़ायदा पहुंचेगा और कब तक पहुंचेगा?

अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग से कैपिटल इकोनॉमिक्स के डिप्टी चीफ़ शिलान शाह की मानें तो, "टैरिफ़ की यह कटौती चीन के विकल्प के रूप में भारत को एक आकर्षक मैन्युफैक्चरिंग सेंटर के तौर पर काफ़ी मज़बूत करने में ख़ासी कारगर साबित हो सकती है, इससे 2026 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर में लगभग  0.2 से  0.3 प्रतिशत अंकों की बढ़ोतरी हो सकती है, यह सात प्रतिशत के क़रीब पहुंच जाएगी, जबकि कैपिटल इकोनॉमिक्स ने 2026 और 2027 दोनों के लिए 6.5 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया है।"

वहीं कोटक महिंद्रा एएमसी के प्रबंध निदेशक निलेश शाह के बक़ौल, "अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है और ये जगज़ाहिर है कि नए टैरिफ़ ने कपड़ा, चमड़ा, जूते और आभूषण जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों को नुक़सान पहुंचाया था, ताज़ा व्यापार आंकड़ों के मुताबिक़, अक्तूबर में निर्यात साल-दर-साल लगभग 12 प्रतिशत घटा, जबकि व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।"

साथ ही ग़ौर करने वाली बात ये है कि ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के निदेशक अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि भारत को इस पर अभी जश्म मानने में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए।

याद रहे कि अमेरिका से 500 अरब डॉलर की ख़रीद का आंकड़ा भी अस्पष्ट है और भारत वर्तमान में अमेरिका से सालाना 50 अरब डॉलर से भी कम का आयात करता है, जिससे ये साफ़ होता है कि यह ठोस प्रतिबद्धता से ज़्यादा एक उम्मीद है। लिहाज़ा जब तक कोई साझा बयान नहीं आता है, तब तक इसे आख़िरी समझौते के बजाय एक सियासी संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए, कुल-मिलाकर सावधानी समय की मांग है।

और अगर बात करें विपक्ष की, तो कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने ट्रंप की ट्रूथ पोस्ट को एक्स पर शेयर करते हुए लिखा है, ''रूसी तेल की ख़रीद बंद, अमेरिकी निर्यात पर टैरिफ़ नहीं, भारत के निर्यात पर 18 फ़ीसदी टैरिफ़, भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर की क़ीमत की ऊर्जा, तकनीक, कृषि उत्पाद और कोयले का आयात करेगा, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता कहां गई?''

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