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श्रम कानून के ख़िलाफ़ भारत बंद: साल 2025 में लागू किए गए चार नए श्रम कानून के विरोध में 10 ट्रेड यूनियनों के जॉइंट फोरम ने आज भारत बंद का आह्वान किया है। इस फोरम को संयुक्त किसान मोर्चा का समर्थन मिला है। बताया जा रहा है कि करीब 30 करोड़ वर्कर्स के बंद में शामिल होने की उम्मीद है। इसे ही भारत बंद का नाम दिया गया है।ट्रेड यूनियनों का यह मानना है कि इन नए कानूनों से मजदूरो के अधिकार कमजोर होते हैं। इसके साथ ही इन नए कानूनों से किसी भी कंपनी को कर्मचारियों को निकालने की खुली छूट मिल जाएगी, जो मजदूरों के हित में नहीं होगा।
12 फरवरी को ट्रेड यूनियनों ने किया 'भारत बंद' का आह्वान
देश में भारत बंद का असर सुबह से ही देखने को मिल रहा है। इसकी शुरूआत कोलकाता और ओडिशा में देखने को मिली। बंद के चलते पब्लिक ट्रांसपोर्ट, बैंकिंग कामकाज और एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन पर असर पड़ सकता है।
#WATCH भुवनेश्वर, ओडिशा: ट्रेड यूनियन को-ऑर्डिनेशन सेंटर, ओडिशा स्टेट कमेटी ने देश भर में हड़ताल में हिस्सा लिया, जिसे कई ट्रेड यूनियनों ने केंद्र सरकार की अलग-अलग पॉलिसी के विरोध में बुलाया है। pic.twitter.com/oYemc2DK3k
— ANI_HindiNews (@AHindinews) February 12, 2026
'भारत बंद' का असर कई सेवाओं पर पड़ेगा
'भारत बंद' के चलते कई राज्यों में परिवहन सेवाएं बाधित हो सकती हैं। बस, ऑटो और ट्रक यूनियनों के समर्थन में हैं इसलिए सार्वजनिक और निजी परिवहन सेवाओं के बाधित होने की पूरी संभावना है। ये समस्या बड़े शहरों में भी हो सकती है।
बैंकिंग सेवाओ की कार्यशेली पर भी पड़ेगा असर
भारतीय रिजर्व बैंक या किसी बैंक ने 12 फरवरी को आधिकारिक अवकाश घोषित नहीं किया है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में काउंटर सेवाएं धीमी रह सकती हैं और चेक क्लीयरेंस में देरी हो सकती है। हालांकि, बैंक औपचारिक रूप से बंद नहीं रहेंगे। ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और एटीएम सेवाएं सुचारू रूप से जारी रहेंगी।
'भारत बंद' के कारण कई सेवाएं सामान्य रहेंगी
'भारत बंद' के कारण अस्पताल, एंबुलेंस और अन्य आपातकालीन सेवाएं सामान्य रूप से जारी रहेंगी। दमकल विभाग, हवाई यात्रा और एयरपोर्ट संचालन पर भी 'भारत बंद' का कोई असर नहीं पड़ेगा।
ट्रेड यूनियनों के समर्थन में उतरे राहुल गांधी
भारत बंद पर राहुल गांधी ने सरकार के ख़िलाफ़ अपना कड़ा रुख़ अपनाते हुए एक्स पर लिखा कि आज देशभर के लाखों मजदूर और किसान अपने हक़ अपने हक़ की आवाज़ बुलंद करने सड़कों पर हैं। मजदूरों को डर है कि चार श्रम संहिताएँ उनके अधिकारों को कमजोर कर देंगी। किसानों को आशंका है कि व्यापार समझौता उनकी आजीविका पर चोट करेगा और मनरेगा को कमजोर या खत्म करने से गांवों का आख़िरी सहारा भी छिन सकता है।
आज देशभर में लाखों मजदूर और किसान अपने हक़ की आवाज़ बुलंद करने सड़कों पर हैं।मजदूरों को डर है कि चार श्रम संहिताएँ उनके अधिकारों को कमजोर कर देंगी। किसानों को आशंका है कि व्यापार समझौता उनकी आजीविका पर चोट करेगा। और मनरेगा को कमजोर या खत्म करने से गांवों का आख़िरी सहारा भी…
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) February 12, 2026
आज 'भारत बंद' के आह्वान में यह 10 ट्रेड यूनियन शामिल हैं
'भारत बंद' का आह्वान 10 ट्रेड यूनियनों के जॉइंट फोरम ने किया है। इनमें प्रमुख यूनियनें जैसे INTUC, AITUC, HMS, CITU, AIUTUC, TUCC, SEWA, AICCTU, LPF और UTUC शामिल हैं. किसान संगठन संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने भी इस बंद का समर्थन किया है और इसे व्यापक विरोध का हिस्सा बताया है। कई किसान संगठन और उनसे जुड़े श्रमिक संगठन भी इस आम हड़ताल में शामिल हो रहे हैं या समर्थन दे रहे हैं।
नए श्रम कानून से मजदूरों को निकालने की मिलेगी खुली छूट
हड़ताल का मुख्य कारण 29 पुराने श्रम कानूनों की जगह लाई गई चार नई श्रम संहिताओं का विरोध है। यूनियनों का कहना है कि ये नए कानून श्रमिकों की सुरक्षा और अधिकारों को कमजोर करते हैं। उनका आरोप है कि इन संहिताओं से नियोक्ताओं के लिए कर्मचारियों को रखना और निकालना आसान हो गया है, जिससे नौकरी की सुरक्षा कम हो गई है. यूनियनों का कहना है कि इससे ठेका और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की सौदेबाजी की ताकत घटती है और श्रमिकों के कल्याण की कीमत पर कंपनियों को ज्यादा छूट मिलती है।
भारत बंद के और भी कई कारण हैं
श्रम कानून और व्यापार समझौते के अलावा, ट्रेड यूनियन और किसानों के और भी मुद्दे हैं, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के निजीकरण और सरकारी नौकरियों में कटौती का विरोध, वेतन में बढ़ोतरी होना, श्रमिकों के लिए पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा और संरंक्षण की कमी आदि शामिल हैं।
विरोध में उतरे श्रमिकों की मांगें
'भारत बंद' के तहत 4 नए श्रम कानून के विरोध में उतरे प्रदर्नकारियों ने इस बात का पुरजोर विरोध किया है कि नए कानूनों को तुरंत वापस लिया जाए। उन्होंने मांग की है कि उन प्रस्तावित विधेयकों को वापस लिया जाए, जिन्हें श्रमिकों और किसानों के अधिकार के ख़िलाफ़ माना जा रहा है।