Friday, 10th of July 2026

साहित्य जगत का एक युग समाप्त: नहीं रहे 'नौकर की कमीज़' के रचयिता विनोद कुमार शुक्ल

Edited By: Mohd Juber Khan | Updated at: December 24th 2025 02:00 PM
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साहित्य जगत का एक युग समाप्त: नहीं रहे 'नौकर की कमीज़' के रचयिता विनोद कुमार शुक्ल

साहित्य जगत का एक युग समाप्त: नहीं रहे 'नौकर की कमीज़' के रचयिता विनोद कुमार शुक्ल

GTC News: हिंदी साहित्य की सबसे मौलिक रचनाओं के रचयिता विनोद कुमार शुक्ल अब हमारे बीच नहीं रहे। अपनी जादुई सादगी और शब्दों के अनूठे शिल्प से साधारण को असाधारण बनाने वाले शुक्ल जी पिछले कुछ समय से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे।

अंतिम समय और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी

परिजनों के मुताबिक़, शुक्ल जी को सांस लेने में तकलीफ़ की वजह से 2 दिसंबर को रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया था। वे 'इंटरस्टिशियल लंग डिजीज' (ILD) और गंभीर निमोनिया से पीड़ित थे। एम्स के डॉक्टरों के अनुसार, उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था (Multiple Organ Failure), जिसके कारण मंगलवार (23 दिसंबर 2025) शाम उनका देहांत हो गया।

छत्तीसगढ़ के पहले 'ज्ञानपीठ' विजेता

विनोद कुमार शुक्ल का निधन उस समय हुआ है, जब हाल ही में 21 नवंबर 2024 को उन्हें देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान 59वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया था। वे छत्तीसगढ़ के पहले साहित्यकार थे जिन्हें यह गौरव प्राप्त हुआ। ख़राब स्वास्थ्य के कारण यह सम्मान उन्हें उनके रायपुर स्थित निवास पर ही प्रदान किया गया था।

प्रमुख कृतियां और साहित्यिक योगदान

जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे शुक्ल जी ने अपनी रचनाओं से आधुनिक हिंदी साहित्य को एक नई दिशा दी। उनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं:

उपन्यास: 'नौकर की कमीज़', 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' (साहित्य अकादमी पुरस्कृत), 'खिलेगा तो देखेंगे'।

कविता संग्रह: 'लगभग जयहिंद', 'वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह', 'सब कुछ होना बचा रहेगा'।

अन्य: उनके उपन्यास 'नौकर की कमीज' पर प्रसिद्ध निर्देशक मणि कौल ने फ़िल्म भी बनाई थी।

शोक संवेदनाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स (Twitter) पर शोक जताते हुए लिखा:

"ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखक विनोद कुमार शुक्ल जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। हिन्दी साहित्य जगत में अपने अमूल्य योगदान के लिए वे हमेशा स्मरणीय रहेंगे।"

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनके लेखन में वंचित समुदायों और साधारण मनुष्य के प्रति जो सहानुभूति थी, वह अद्वितीय थी।

बेशक़ विनोद कुमार शुक्ल का जाना हिंदी साहित्य के लिए एक ऐसी अपूरणीय क्षति है जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। उन्होंने भाषा को अलंकृत करने के बजाय उसे 'नंगेपन' और 'सादगी' के साथ पेश किया, जो उनकी सबसे बड़ी ताक़त थी।

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