GTC News: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप करते हुए अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा से संबंधित अपने 20 नवंबर 2025 के आदेश को 'आस्थगित' कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि इस मामले में कई गंभीर क़ानूनी और वैज्ञानिक मुद्दे हैं, जिनकी गहन जांच की आवश्यकता है।
क्या था 20 नवंबर का विवादित आदेश?
नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और पर्यावरण मंत्रालय (MoEF&CC) की उस सिफारिश को स्वीकार कर लिया था, जिसमें अरावली को परिभाषित करने के लिए '100 मीटर की ऊंचाई' का पैमाना रखा गया था।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने ट्वीट किया, "मैं अरावली रेंज से जुड़े अपने आदेश पर रोक लगाने और मुद्दों का अध्ययन करने के लिए एक नई समिति बनाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का स्वागत करता हूं। हम अरावली रेंज की सुरक्षा और बहाली में MOEFCC से मांगी गई सभी सहायता देने के… pic.twitter.com/xErm4H9c9E
— ANI_HindiNews (@AHindinews) December 29, 2025
परिभाषा: इसके अनुसार, केवल उन्हीं भू-आकृतियों को 'अरावली पहाड़ी' माना जाना था जिनकी ऊंचाई अपने आसपास के धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक हो।
दूरी का नियम: दो पहाड़ियों के बीच की दूरी यदि 500 मीटर से कम हो, तो उन्हें 'रेंज' माना जाना था।
कोर्ट ने रोक क्यों लगाई?
पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि इस परिभाषा से अरावली का एक बहुत बड़ा हिस्सा सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाएगा। कोर्ट ने अब इन चिंताओं को स्वीकार किया है:
सुरक्षा कवच का कम होना: विशेषज्ञों का दावा है कि इस 100 मीटर के नियम से अरावली की लगभग 12,000 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही संरक्षित रह पाएंगी। बाकी हिस्सा खनन के लिए खुल सकता है।
पारिस्थितिक निरंतरता (Ecological Continuity): कोर्ट ने सवाल उठाया कि दो पहाड़ियों के बीच के 500 मीटर के अंतराल में अगर खनन की अनुमति दी गई, तो इससे पूरी पर्वतमाला की निरंतरता टूट जाएगी।
वैज्ञानिक आधार की कमी: कोर्ट ने महसूस किया कि पिछली रिपोर्ट मुख्य रूप से नौकरशाहों द्वारा तैयार की गई थी। अब कोर्ट एक निष्पक्ष और स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति (High-Powered Expert Committee) बनाना चाहता है जो वैज्ञानिक आधार पर अपनी राय पेश करे।
#WATCH सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और अरावली रेंज की सेंट्रल पर्यावरण मंत्रालय की परिभाषा को स्वीकार करने के अपने पहले के फैसले (जो 20 नवंबर को जारी किया गया था) को "स्थगित" कर दिया है।कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने कहा, "आज सुप्रीम कोर्ट में बिल्कुल दूध का दूध पानी का पानी… pic.twitter.com/zPtOVOFkyv
— ANI_HindiNews (@AHindinews) December 29, 2025
'सुओ मोटो' (Suo Motu) संज्ञान और अगली कार्यवाही
दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वयं संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए शनिवार (27 दिसंबर) को ही सुनवाई का फैसला किया था। सोमवार की सुनवाई के दौरान:
चार राज्यों को नोटिस: कोर्ट ने केंद्र सरकार के साथ-साथ अरावली क्षेत्र में आने वाले चार राज्यों— हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और दिल्ली को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
खनन पर असर: जब तक यह मामला लंबित है, तब तक अरावली क्षेत्र में किसी भी नई खनन लीज (Mining Lease) पर प्रतिबंध जारी रहने की संभावना है।
अगली सुनवाई: मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 21 जनवरी 2026 को तय की गई है।
पर्यावरणविदों की जीत के रूप में देखा जा रहा फैसला
अरावली को बचाने के लिए चल रहे अभियानों (जैसे #SaveAravalli) से जुड़े कार्यकर्ताओं ने इस रोक का स्वागत किया है। अरावली न केवल दिल्ली-NCR के लिए 'ग्रीन लंग्स' है, बल्कि यह थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने वाली एक प्राकृतिक बाधा भी है। यदि पहाड़ियों की परिभाषा संकुचित होती, तो इससे मरुस्थलीकरण (Desertification) और भूजल स्तर गिरने का खतरा बढ़ जाता।
संक्षेप में समझिए पूरा मामला:
विवरण जानकारी
कोर्ट की पीठ CJI सूर्यकांत, जस्टिस माहेश्वरी, जस्टिस मसीह
स्थगित आदेश 20 नवंबर 2025 का '100 मीटर ऊंचाई' वाला नियम
मुख्य मुद्दा अरावली की परिभाषा संकुचित होने से खनन माफ़ियाओं को लाभ होने का डर
अगला क़दम नई विशेषज्ञ समिति का गठन और 21 जनवरी को सुनवाई
#WATCH गुरुग्राम, हरियाणा | सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और अरावली रेंज की सेंट्रल पर्यावरण मंत्रालय की परिभाषा को स्वीकार करने के अपने पहले के फैसले (जो 20 नवंबर को जारी किया गया था) पर रोक लगा दी है।पर्यावरणविद विमलेंदु झा ने कहा, "...कोर्ट ने अपने पर्सनल नोट्स से यह… pic.twitter.com/lYcgmqpZYC
— ANI_HindiNews (@AHindinews) December 29, 2025
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट का यह रुख़ साफ़ करता है कि वह आर्थिक गतिविधियों (खनन) और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के लिए 'सतर्कता के सिद्धांत' (Precautionary Principle) को प्राथमिकता दे रहा है।