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अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा और 90% क्षेत्र पर संकट का ख़तरा

By: GTC News Desk | Edited By: Mohd Juber Khan | Updated at: December 22nd 2025 02:26 PM
अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा और 90% क्षेत्र पर संकट का ख़तरा

अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा और 90% क्षेत्र पर संकट का ख़तरा

नई दिल्ली/गुरुग्राम: उत्तर भारत के लिए 'प्राकृतिक सुरक्षा कवच' मानी जाने वाली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला, अरावली, इस समय एक बड़े क़ानूनी और पर्यावरणीय विवाद के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली की एक नई 'मानकीकृत परिभाषा' को मंज़ूरी दिए जाने के बाद विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इससे इस पर्वतमाला का लगभग 90% हिस्सा क़ानूनी संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकता है।

क्या है अरावली की नई परिभाषा?

20 नवंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति की सिफ़ारिशों को मंज़ूर कर लिया। इस नई परिभाषा के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

100 मीटर का मानक: अब केवल उन्हीं भू-आकृतियों (landforms) को 'अरावली पहाड़ी' माना जाएगा जिनकी ऊंचाई स्थानीय धरातल से 100 मीटर या उससे ज़्यादा है।

अरावली शृंखला (Range): दो या दो से ज़्यादा ऐसी पहाड़ियां जो एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में हों, उन्हें 'अरावली शृंखला' का हिस्सा माना जाएगा।

एकसमान नियम: दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात—इन चारों राज्यों में अब यही परिभाषा लागू होगी ताकि खनन और निर्माण संबंधी नियमों में स्पष्टता लाई जा सके।

विवाद का मुख्य कारण: 90% क्षेत्र पर ख़तरा क्यों?

पर्यावरणविदों और भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की आंतरिक रिपोर्टों के अनुसार, यह 100 मीटर का मापदंड अरावली के अस्तित्व के लिए घातक साबित हो सकता है:

पहाड़ियों का अस्तित्व: राजस्थान में मैप की गई लगभग 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 (लगभग 8.7%) ही ऐसी हैं जिनकी ऊंचाई 100 मीटर से अधिक है।

क़ानूनी सुरक्षा का अभाव: 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली छोटी पहाड़ियां और ढलानें अब तकनीकी रूप से 'अरावली' नहीं कहलाएंगी। इसका मतलब है कि इन क्षेत्रों में खनन, निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों पर लगा प्रतिबंध हट सकता है।

पारिस्थितिकीय विखंडन: अरावली एक निरंतर शृंखला है। छोटी पहाड़ियों को हटाने से इस शृंखला में बड़े अंतराल (gaps) पैदा हो जाएंगे, जिससे थार मरुस्थल की धूल भरी हवाओं को दिल्ली-NCR तक पहुंचने से रोकने वाला 'प्राकृतिक बैरियर' टूट जाएगा।

सरकार का पक्ष: "अरावली सुरक्षित है"

विवाद बढ़ता देख केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव और मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी किया है:

सरकार का दावा है कि नई परिभाषा से अरावली का 90% से अधिक हिस्सा सुरक्षित क्षेत्र (Protected Area) के अंतर्गत ही रहेगा।

यह भी साफ़ किया गया है कि 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों के चारों ओर की निचली सीमा (bounding contour) के भीतर आने वाला पूरा क्षेत्र प्रतिबंधित रहेगा, चाहे वहां की जमीन की ऊंचाई कुछ भी हो। बहरहाल फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यापक 'सतत खनन प्रबंधन योजना' (MPSM) बनने तक नए खनन पट्टों पर रोक लगा दी है।

दिल्ली-NCR पर क्या होगा असर?

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि छोटी पहाड़ियों पर खनन या निर्माण शुरू होता है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे:

प्रदूषण: अरावली दिल्ली-NCR के लिए 'फेफड़ों' का काम करती है। पहाड़ियों के घटने से वायु गुणवत्ता (AQI) और ख़राब होगी।

जल संकट: ये पहाड़ियां भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) का मुख्य स्रोत हैं। इनके नष्ट होने से वाटर टेबल तेज़ी से गिरेगा।

रेगिस्तानीकरण: राजस्थान से आने वाली रेत को रोकने वाला कवच कमजोर होने से हरियाणा और दिल्ली में मरुस्थलीकरण बढ़ सकता है।

"अरावली को केवल फीते या ऊंचाई से नहीं नापा जा सकता। यह एक जटिल पारिस्थितिक तंत्र है जिसे बचाना उत्तर भारत के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।" — पर्यावरण कार्यकर्ता

क्या है अगला क़दम?

सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय को भारतीय वन अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) की मदद से अरावली के लिए एक विस्तृत प्रबंधन योजना तैयार करने का निर्देश दिया है। तब तक नए खनन पर अंतरिम रोक जारी रहेगी।