Sunday, 11th of January 2026

दुनिया की सबसे तेज़ अर्थव्यवस्था के बावजूद रिकॉर्ड दबाव में क्यों है रुपया?

Reported by: GTC News Desk  |  Edited by: Mohd Juber Khan  |  December 04th 2025 02:16 PM  |  Updated: December 04th 2025 02:16 PM
दुनिया की सबसे तेज़ अर्थव्यवस्था के बावजूद रिकॉर्ड दबाव में क्यों है रुपया?

दुनिया की सबसे तेज़ अर्थव्यवस्था के बावजूद रिकॉर्ड दबाव में क्यों है रुपया?

नई दिल्ली: एक तरफ जहां भारत दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी धाक जमा रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय रुपया (INR) अमेरिकी डॉलर (USD) के मुक़ाबले ऐतिहासिक गिरावट दर्ज कर रहा है। हाल ही में, रुपया पहली बार ₹90 के मनोवैज्ञानिक और रिकॉर्ड निचले स्तर को पार कर गया, जिसने नीति निर्माताओं और आम जनता, दोनों की चिंता बढ़ा दी है।

यह विरोधाभास—मज़बूत आर्थिक विकास के बावजूद मुद्रा का कमज़ोर होना—दर्शाता है कि रुपये पर दबाव के कारण मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय और बाहरी कारक हैं। अब इस बाबत विपक्षी पार्टियों की भी प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं।

रुपये की ऐतिहासिक गिरावट के प्रमुख कारण:

रुपये की इस गिरावट के पीछे कई जटिल कारक ज़िम्मेदार हैं:

1. विदेशी पूंजी की भारी निकासी (FPI Outflows)

डॉलर का आकर्षण: वैश्विक अनिश्चितता और अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की अटकलों के कारण, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय इक्विटी और बॉन्ड बाजारों से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। वे इस पूंजी को अधिक सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर-मूल्यवान संपत्ति में निवेश कर रहे हैं।

प्रभाव: जब FPI अपनी पूंजी वापस खींचते हैं, तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं। बाज़ार में डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमज़ोर होता जाता है। इस साल अब तक FPIs द्वारा अरबों डॉलर की निकासी हो चुकी है।

2. बढ़ता व्यापार घाटा (Widening Trade Deficit)

उच्च आयात बिल: भारत का आयात (खरीद) निर्यात (बिक्री) की तुलना में कहीं ज़्यादा है, जिसके कारण व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है। भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य मशीनरी का आयात बिल भी लगातार बढ़ रहा है।

डॉलर की मांग: कच्चे तेल, सोना, और अन्य आयातित वस्तुओं का भुगतान डॉलर में करना पड़ता है, जिससे डॉलर की मांग तेज़ी से बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है।

3. भारत-अमेरिका व्यापार तनाव

ट्रेड डील में देरी: भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में हो रही देरी से विदेशी निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।

टैरिफ का दबाव: अमेरिका द्वारा कुछ भारतीय निर्यात पर लगाए गए उच्च टैरिफ के कारण भारतीय निर्यात की गति धीमी हुई है, जिससे डॉलर का प्रवाह प्रभावित हुआ है।

4. वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता

विश्व भर में बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता और संघर्ष (जैसे यूक्रेन युद्ध) ने निवेशकों को जोखिम लेने से रोका है, और वे 'सुरक्षित ठिकानों' (Safe Havens) के रूप में डॉलर की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं (Emerging Markets) की मुद्राओं पर दबाव बना हुआ है।

आम आदमी पर क्या होगा असर?

रुपये की कमज़ोरी का सीधा और सबसे बड़ा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है, क्योंकि इससे आयातित महंगाई बढ़ती है:

महंगाई का बढ़ना: कच्चा तेल, गैस, और मशीनरी का आयात महंगा हो जाता है। इससे पेट्रोल, डीज़ल, और एलपीजी की क़ीमतें बढ़ती हैं, जिसका सीधा असर परिवहन लागत पर पड़ता है। बढ़ी हुई परिवहन लागत के कारण सब्ज़ियां, किराना और रोज़मर्रा के सामान महंगे हो जाते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कीमत: मोबाइल फोन, लैपटॉप, टीवी, और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स या उनके पुर्जे (पार्ट्स) विदेश से आयात होते हैं। डॉलर के महंगा होने से इन उत्पादों की कीमतें बढ़ जाती हैं।

विदेश में शिक्षा और यात्रा: विदेश में पढ़ने वाले छात्रों के लिए फीस और रहने का खर्च बढ़ जाता है। इसके अलावा, विदेशी यात्राएं और अंतर्राष्ट्रीय छुट्टियां भी महंगी हो जाती हैं, क्योंकि स्थानीय मुद्रा (जैसे डॉलर) खरीदने के लिए अधिक रुपये देने पड़ते हैं।

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) का हस्तक्षेप

रुपये की तेज़ गिरावट को थामने और अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) सक्रिय रूप से बाज़ार में हस्तक्षेप कर रहा है।

डॉलर की बिक्री: RBI अपने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करके बाज़ार में डॉलर बेच रहा है, ताकि रुपये की आपूर्ति को कम किया जा सके और इसकी गिरावट की गति को धीमा किया जा सके।

रणनीति: RBI रुपये को एक कठोर स्तर पर बनाए रखने के बजाय, इसकी अस्थिरता (Volatility) को प्रबंधित करने पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहा है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि RBI एक क्रमिक अवमूल्यन (Gradual Depreciation) की अनुमति दे रहा है ताकि भारतीय निर्यात को वैश्विक बाज़ार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया जा सके।

हालांकि, बाहरी कारकों का दबाव इतना अधिक है कि RBI के हस्तक्षेप के बावजूद रुपया अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गया है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की चुनौतियों के सामने भारत की स्थिति को दर्शाता है।