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नेपाल हिंसा में भारतीय महिला की मौत से जुड़े ₹100 करोड़ मुआवज़े की याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में 9 फरवरी 2026 को फिर सूचीबद्ध: दिल्ली हाईकोर्ट ने नेपाल में हुई हिंसक नागरिक अशांति के दौरान एक भारतीय महिला की मौत को लेकर दायर रिट याचिका को 9 फरवरी 2026 के लिए पुनः सूचीबद्ध कर दिया है। याचिका मृतका के पति द्वारा जवाबदेही तय करने और संवैधानिक मुआवज़े की मांग को लेकर दायर की गई है। गुरुवार को यह मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था, लेकिन संबंधित पीठ के एकत्र न होने के कारण इस पर सुनवाई नहीं हो सकी। इस याचिका पर न्यायमूर्ति पुरुषाइंदर कुमार कौरव द्वारा सुनवाई की जानी थी। याचिका में भारत सरकार, संबंधित संवैधानिक प्राधिकरणों तथा काठमांडू स्थित एक अंतरराष्ट्रीय लक्ज़री होटल के प्रबंधन से संयुक्त रूप से ₹100 करोड़ के संवैधानिक मुआवज़े की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि 9 सितंबर 2025 को नेपाल में हुए जेन ज़ी आंदोलन के दौरान दिवंगत राजेश गोला की मृत्यु “टाली जा सकने वाली और पूर्णतः रोकी जा सकने वाली” थी।
न फायर अलार्म बजा, न निकासी की उचित निकासी प्रक्रिया का पालन हुआ, होटल स्टॉफ भी नदारद
यह रिट याचिका मृतका के पति रामबीर सिंह गोला द्वारा, अधिवक्ता एवं सुप्रीम कोर्ट के पीआईएल कार्यकर्ता अभिषेक चौधरी के माध्यम से दायर की गई है। याचिका के अनुसार, दंपती 7 सितंबर 2025 को धार्मिक यात्रा के उद्देश्य से नेपाल गए थे और काठमांडू के एक प्रतिष्ठित पांच सितारा होटल में ठहरे हुए थे। उन्होंने होटल द्वारा दिए गए सुरक्षा और संरक्षा आश्वासनों पर भरोसा किया था। याचिका में कहा गया है कि काठमांडू में जब हिंसा, आगजनी और व्यापक अशांति बढ़ रही थी, तब भी होटल प्रबंधन लगातार मेहमानों को यह आश्वासन देता रहा कि स्थिति नियंत्रण में है।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि उन्हें होटल छोड़ने से हतोत्साहित किया गया और बेहतर सुरक्षा के आश्वासन के साथ ऊपरी मंज़िल पर स्थानांतरित होने के लिए राज़ी किया गया, जो बाद में घातक रूप से भ्रामक साबित हुआ। 09 सितंबर की रात, कथित रूप से एक हिंसक भीड़ ने होटल परिसर में घुसकर इमारत के कुछ हिस्सों में आग लगा दी। याचिका के अनुसार, इस दौरान होटल की आपातकालीन व्यवस्था पूरी तरह विफल हो गई — न तो फायर अलार्म बजे, न निकासी प्रक्रिया का पालन हुआ और आरोप है कि होटल स्टाफ परिसर छोड़कर भाग गया।
याचिकाकर्ता ने असुविधा के चलते चौथी मंजिल से गिरने और समय रहते उपचार न मिलने से मृत्यु हो जाने का लगाया आरोप
याचिकाकर्ता का यह भी आरोप है कि उन्होंने काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास और विदेश मंत्रालय को कई बार फोन कर तत्काल सहायता की गुहार लगाई, लेकिन भारतीय नागरिकों के लिए कोई कांसुलर हस्तक्षेप, बचाव समन्वय या आपात सहायता प्रदान नहीं की गई। निकास मार्ग अवरुद्ध होने और जान पर तत्काल खतरे के चलते, याचिकाकर्ता और उनकी पत्नी ने कथित रूप से रस्सियों के सहारे बाहर निकलने का प्रयास किया। इसी दौरान राजेश गोला चौथी मंज़िल से गिर गईं और उन्हें गंभीर चोटें आईं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उन्हें समय पर और समुचित चिकित्सा उपचार नहीं दिया गया, एक स्थानीय अस्पताल में उन्हें गलत तरीके से मृत घोषित कर दिया गया, और आवश्यक चिकित्सा सहायता के बिना शवगृह में छोड़ दिया गया — जिससे, याचिकाकर्ता के अनुसार, उनकी मृत्यु शीघ्र हो गई। याचिका में यह भी कहा गया है कि नेपाल सरकार ने इस घटना को हत्या का मामला दर्ज किया है।
याचिका में उल्लेख किया गया है कि नेपाल की अशांति के दौरान जान गंवाने वाली एकमात्र भारतीय नागरिक राजेश गोला थीं, जिससे अंतरराष्ट्रीय होटल उद्योग की सुरक्षा ज़िम्मेदारियों और विदेश में भारतीय नागरिकों की रक्षा को लेकर भारतीय राज्य की संवैधानिक भूमिका पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि 22 सितंबर 2025 को विस्तृत कानूनी नोटिस भेजे जाने के बावजूद, अब तक किसी प्रकार की जांच, मुआवज़ा प्रक्रिया या जवाबदेही तय करने की पहल नहीं की गई है।
याचिका में महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं, जिनमें यह भी शामिल है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का मौलिक अधिकार भारत से बाहर रह रहे भारतीय नागरिकों पर भी लागू होता है, और क्या कांसुलर संरक्षण प्रदान करने में विफलता इस अधिकार का उल्लंघन मानी जा सकती है। याचिका के माध्यम से न्यायालय की निगरानी में न्यायिक जांच, दोषी अधिकारियों और संस्थानों की जिम्मेदारी तय करने, उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई, तथा भारत सरकार और संबंधित होटल प्रबंधन से संयुक्त रूप से ₹100 करोड़ का संवैधानिक मुआवज़ा दिए जाने की मांग की गई है। इसके साथ ही, विदेश यात्रा करने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और आपात प्रतिक्रिया व्यवस्था को मजबूत करने के लिए व्यवस्थागत सुधारों की भी मांग की गई है।