'घूसखोर पंडत' फिल्म का नाम बदलना होगा, सुप्रीम कोर्ट ने दिया निर्देश, 19 फरवरी को होगी अगली सुनवाई
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नेटफ्लिक्स की फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ के निर्माताओं को इसका शीर्षक बदलने का निर्देश दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि यह शीर्षक एक विशेष समुदाय को अपमानित करने वाला है और संविधान के तहत इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने फिल्म निर्माताओं को नोटिस जारी करते हुए उनसे वैकल्पिक शीर्षक सुझाने को कहा। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि निर्माता एक हलफनामा दाखिल कर नए प्रस्तावित नाम और आदेश के अनुपालन में किए गए अन्य बदलावों की जानकारी दें। मामले की अगली सुनवाई 19 फरवरी को निर्धारित की गई है।
फिल्म की रिलीज और प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की गई थी
यह सुनवाई एक जनहित याचिका (PIL) पर हो रही थी, जिसमें फिल्म की रिलीज और प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि फिल्म का शीर्षक और प्रचार सामग्री जाति और धर्म आधारित रूढ़ियों को बढ़ावा देती है तथा ब्राह्मण समुदाय की गरिमा और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाती है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक सीमाओं पर कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, "आप किसी को क्यों अपमानित करेंगे? यह नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ है। जागरूक होना एक बात है, लेकिन ऐसे समय में जब देश में पहले से अशांति है, इस तरह की स्थिति पैदा करना उचित नहीं। हमें लगा था कि फिल्म निर्माता, पत्रकार आदि जिम्मेदार लोग हैं और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए गए उचित प्रतिबंधों से अवगत हैं।"
संविधान में निहित ‘बंधुत्व’ (Fraternity) के सिद्धांत पर जोर देते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि संविधान निर्माताओं को भारत की विविधता, जाति, धर्म और समुदायों का पूरा बोध था।"समाज के किसी भी वर्ग को अपमानित नहीं किया जाना चाहिए। यदि आप अपनी स्वतंत्रता का उपयोग किसी वर्ग को नीचा दिखाने के लिए करते हैं, तो हम इसकी अनुमति नहीं दे सकते।"
याचिका में अनुच्छेद 14, 21 और 25 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था
याचिकाकर्ता महेंद्र चतुर्वेदी, जो स्वयं को वेद-शास्त्रों के अध्ययन और अध्यापन से जुड़े आचार्य बताते हैं, उन्होंने अधिवक्ता विनीत जिंदल के माध्यम से दायर याचिका में कहा कि ‘पंडित’ शब्द ऐतिहासिक रूप से विद्वता, नैतिक आचरण और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का प्रतीक है। इसे भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से जोड़ना मानहानिकारक और सांप्रदायिक रूप से आक्रामक है।
याचिका में यह भी कहा गया कि अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) के तहत उस पर उचित प्रतिबंध लागू होते हैं। इसमें मानहानि या साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाली सामग्री शामिल नहीं हो सकती। साथ ही, अनुच्छेद 14, 21 और 25 के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया तथा OTT प्लेटफॉर्म्स के लिए प्रभावी नियामक तंत्र की कमी पर चिंता जताई गई।
नेटफ्लिक्स ने फिल्म के शीर्षक को लेकर कही थी ये बात
इससे पहले 10 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट को नेटफ्लिक्स की ओर से बताया गया था कि निर्माता ने उठाई गई आपत्तियों को देखते हुए फिल्म का नाम बदलने का “सचेत निर्णय” लिया है। इसके बाद हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा यह कहते हुए कर दिया था कि याचिकाकर्ता की आपत्ति केवल शीर्षक तक सीमित थी, जो अब बदले जाने के निर्णय के बाद समाप्त हो गई है।