Sunday, 11th of January 2026

अखिलेश यादव ने PDA में 'अच्छा अगड़ा' के साथ गढ़ी नई परिभाषा, यूपी की राजनीति में छिड़ी बहस

Reported by: GTC News Desk  |  Edited by: Mohd Juber Khan  |  December 11th 2025 04:28 PM  |  Updated: December 11th 2025 04:28 PM
अखिलेश यादव ने PDA में 'अच्छा अगड़ा' के साथ गढ़ी नई परिभाषा, यूपी की राजनीति में छिड़ी बहस

अखिलेश यादव ने PDA में 'अच्छा अगड़ा' के साथ गढ़ी नई परिभाषा, यूपी की राजनीति में छिड़ी बहस

लखनऊ:उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातिगत समीकरणों के महारथी माने जाने वाले समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने चर्चित चुनावी फॉर्मूले पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) में एक महत्वपूर्ण विस्तार किया है। उन्होंने इस समीकरण में अब 'अच्छा अगड़ा' (Good Forward Castes) शब्द जोड़कर एक नया सियासी विमर्श छेड़ दिया है। इस विस्तार का उद्देश्य केवल सामाजिक न्याय के कोर वोट बैंक को मज़बूत करना नहीं है, बल्कि उस वर्ग में भी पैठ बनाना है जो अब तक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का मज़बूत आधार माना जाता रहा है।

PDA अब 'अच्छा अगड़ा' के साथ

अखिलेश यादव ने स्पष्ट किया है कि 'पीडीए' सामाजिक न्याय की लड़ाई का मूल आधार रहेगा, लेकिन अब इसमें 'अच्छा अगड़ा' वर्ग को भी सम्मानजनक स्थान दिया जाएगा।

पीडीए (PDA): यह समीकरण सपा के लिए प्रमुख चुनावी हथियार रहा है, जो उत्तर प्रदेश की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से (पिछड़ा वर्ग, दलित और मुस्लिम) को एक मंच पर लाने पर केंद्रित है।

'अच्छा अगड़ा' की परिभाषा: अखिलेश यादव ने अपने बयान में यह संकेत दिया है कि 'अच्छा अगड़ा' वह वर्ग है जो सामाजिक न्याय में विश्वास रखता है, धर्मनिरपेक्षता का समर्थन करता है और समाज के सभी वर्गों के साथ समानता और भाईचारे के साथ खड़ा होता है। यह विभाजन उन 'बुराई अगड़ों' या 'नकारात्मक अगड़ों' से अलग है, जो सिर्फ जातिवादी या सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देते हैं।

सियासी दांव के पीछे का गणित

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव का यह नया विमर्श आगामी चुनावों को देखते हुए एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है:

1. भाजपा के गढ़ में सेंधमारी

भाजपा की सफ़लता का एक बड़ा कारण सवर्ण (अगड़ा) वर्ग का एकतरफा समर्थन रहा है। 'अच्छा अगड़ा' को साथ लाने की बात करके सपा नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि वह जाति-आधारित घृणा की राजनीति नहीं कर रही है, बल्कि वह उन सवर्णों को भी सम्मान देती है जो प्रगतिशील विचारों के हैं और सत्ताधारी दल से नाराज़ हैं।

2. संकीर्ण राजनीति के आरोप से बचाव

विपक्षी दल, ख़ासकर भाजपा, अक्सर सपा पर केवल जाति-विशेष की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। 'अच्छा अगड़ा' को जोड़ने से सपा सर्वेजन हिताय, सर्वेजन सुखाय की व्यापक अपील करने की स्थिति में आ सकती है और इस आरोप का खंडन कर सकती है कि वह एक संकीर्ण राजनीतिक दल है।

3. शिक्षित और युवा अगड़ा वर्ग को आकर्षित करना

युवा, शिक्षित और शहरी अगड़ा वर्ग, जो रोजगार, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सौहार्द जैसे मुद्दों पर भाजपा से निराश है, उसे यह नया विमर्श एक विकल्प प्रदान कर सकता है। सपा उन्हें सामाजिक न्याय के मंच पर एक सम्मानजनक भागीदार के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है।

अब आ रही हैं राजनीतिक प्रतिक्रियाए

अखिलेश यादव के इस बयान पर सियासी गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं।

भाजपा की प्रतिक्रिया: सत्ताधारी दल ने इस पर कटाक्ष करते हुए कहा है कि सपा अब अपनी हार निश्चित देखकर तुष्टीकरण की राजनीति से बाहर आने का दिखावा कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा का इतिहास हमेशा से ही जातिवादी और विभाजनकारी रहा है।

बसपा (BSP) की प्रतिक्रिया: बसपा ने सपा के इस कदम को महज चुनावी नाटक करार दिया है। बसपा नेताओं ने कहा कि दलित और पिछड़ा वर्ग अब समझ चुका है कि ये दल सिर्फ चुनाव के समय ही उन्हें याद करते हैं।

सपा के सहयोगी: सहयोगी दलों ने इस कदम का स्वागत किया है और इसे सामाजिक समावेश (Social Inclusion) की दिशा में एक सकारात्मक पहल बताया है।

आगामी राजनीति पर प्रभाव

'अच्छा अगड़ा' का विमर्श उत्तर प्रदेश की राजनीति को कितना प्रभावित करेगा, यह अभी देखना बाकी है। यदि अखिलेश यादव इस नए विमर्श को प्रभावी ढंग से जमीन पर उतार पाते हैं, और 'अगड़े' वर्ग में विश्वास पैदा कर पाते हैं कि उनकी पार्टी उन्हें यथोचित सम्मान और प्रतिनिधित्व देगी, तो यह भाजपा के सामाजिक गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है। यह क़दम सपा को केवल एम-वाई (मुस्लिम-यादव) और पीडीए की सीमित पहचान से बाहर निकालकर एक व्यापक-आधारित (Broad-Based) पार्टी के रूप में स्थापित करने का प्रयास है।