भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 100 वर्ष: कानपुर अधिवेशन से शुरू हुआ लाल झंडे का ऐतिहासिक सफ़र

By:  Mohd Juber Khan December 25th 2025 02:05 PM

GTC News: आज से ठीक 100 साल पहले, दिसंबर 1925 में उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर में भारतीय राजनीति की एक ऐसी नींव रखी गई थी, जिसने देश के स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद की लोकतांत्रिक यात्रा को एक नई दिशा दी। 26 दिसंबर 1925 को कानपुर के उसी मैदान में, जहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था, भारत की पहली कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) का औपचारिक गठन हुआ था। आज यह पार्टी अपने गठन का 'शताब्दी वर्ष' मना रही है।

इतिहास के पन्नों से: कैसे हुई शुरुआत?

भारत में साम्यवादी विचारधारा का प्रसार 1917 की रूसी क्रांति के बाद तेजी से हुआ। हालांकि 1920 में ताशकंद में एम.एन. राय के नेतृत्व में एक प्रयास हुआ था, लेकिन भारतीय धरती पर बिखरे हुए कम्युनिस्ट समूहों को एकजुट करने का श्रेय कानपुर अधिवेशन को जाता है।

आयोजक: इस सम्मेलन के मुख्य सूत्रधार सत्यभक्त थे।

अध्यक्षता: सम्मेलन की अध्यक्षता मद्रास के प्रसिद्ध नेता सिंगारावेलु चेट्टियार ने की थी।

स्वागत समिति: महान क्रांतिकारी और शायर हसरत मोहानी (जिन्होंने 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा दिया) स्वागत समिति के अध्यक्ष थे।

प्रथम महासचिव: इस अधिवेशन में एस.वी. घाटे को पार्टी का पहला महासचिव चुना गया।

दमन और संघर्ष का दौर

अंग्रेज़ी हुकूमत साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव से डरी हुई थी। पार्टी के गठन से पहले ही ब्रिटिश सरकार ने कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र केस (1924) के ज़रिए कम्युनिस्ट नेताओं को जेल में डाल दिया था। इसके बावजूद, कानपुर अधिवेशन में देश भर से लगभग 500 प्रतिनिधि जुटे, जिनमें मज़दूर, किसान और बुद्धिजीवी शामिल थे।

भारतीय राजनीति में CPI का योगदान

पूर्ण स्वराज की मांग: कम्युनिस्टों ने ही सबसे पहले कांग्रेस के मंच से भारत के लिए 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव रखा था, जब कांग्रेस केवल 'डोमिनियन स्टेटस' की बात कर रही थी।

मज़दूर-किसान एकता: पार्टी ने ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) और अखिल भारतीय किसान सभा जैसे संगठनों के माध्यम से हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ उठाई।

तेलंगाना और तेभागा आंदोलन: आजादी के समय साम्यवादियों ने ज़मींदारी प्रथा के खिलाफ ऐतिहासिक सशस्त्र और जन-आंदोलनों का नेतृत्व किया।

संसदीय लोकतंत्र: 1957 में केरल में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार बनाकर CPI ने इतिहास रचा।

विभाजन और वर्तमान प्रासंगिकता

1964 में वैचारिक मतभेदों की वजह से पार्टी का विभाजन हुआ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) का जन्म हुआ। हालांकि आज चुनावी राजनीति में वामपंथ की ताकत पहले के मुक़ाबले कम हुई है, लेकिन सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और श्रमिक अधिकारों की लड़ाई में इसकी भूमिका आज भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

क्या है शताब्दी समारोह की अहमियत?

आज कानपुर समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में 'लाल झंडा' फहराकर और रैलियां आयोजित कर इस शताब्दी वर्ष का जश्न मनाया जा रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि 100 साल बाद भी उनका मुख्य उद्देश्य एक शोषणमुक्त समाज की स्थापना करना है।

याद रहे कि CPI अपना स्थापना दिवस 26 दिसंबर 1925 मानती है, वहीं CPI(M) इसकी शुरुआत 17 अक्टूबर 1920 (ताशकंद) से मानती है।

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