पहले बसपा, फ़िर कांग्रेस और अब सपा में शामिल हुए नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी

By  Mohd Juber Khan February 15th 2026 04:50 PM

GTC News: कहते हैं ना कि राजनीति में ना को स्थाई दुश्मन होता है, ना को कोई स्थाई दोस्त। एक बार फ़िर से ये बात सही साबित हुई है। दरअसल उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ा उलटफे़र देखने को मिला है। असल में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पूर्व दिग्गज नेता और कभी मायावती के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी ने औपचारिक तौर पर समाजवादी पार्टी (सपा) का दामन थाम लिया है। लखनऊ में समाजवादी पार्टी के मुख्यालय पर आयोजित एक कार्यक्रम में अखिलेश यादव की मौजूदगी में उन्होंने पार्टी की सदस्यता ली। नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी के साथ ही कई पूर्व विधायक और उनके समर्थक भी सपा में शामिल हो गए हैं।

अखिलेश यादव की मौजूदगी में क्या बोले नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी?

समाजवादी पार्टी में शामिल होने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी ने अखिलेश यादव के नेतृत्व की सराहना की और अपनी पिछली पार्टी (कांग्रेस) को लेकर खुलकर बात की। इस मौक़े पर सिद्दीक़ी ने कहा, "अखिलेश यादव से मेरे पुराने और मधुर संबंध रहे हैं, मैं उनके मार्गदर्शन में काम करने और कंधे से कंधा मिलाकर संगठन को मज़बूत करने आया हूं।" इस दौरान उन्होंने साफ़ किया कि कांग्रेस में उनके पास करने के लिए 'ज़मीनी काम' नहीं था। उन्होंने कहा, "मैं एक ज़मीनी कार्यकर्ता हूँ, कांग्रेस में मुझे मीडिया विभाग का अध्यक्ष या समितियों का सदस्य बनाया गया, जो फील्ड का काम नहीं है, मैं 8 साल तक उस तरह काम नहीं कर पाया जैसा मैं करना चाहता था।"

इस मौक़े पर उन्होंने दावा किया कि अगर संगठन मज़बूत होगा तो राज्य मज़बूत होगा, और सपा के इस 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले से उत्तर प्रदेश में बदलाव आएगा।

नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी का सियासी सफ़र

नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी का राजनीतिक इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। उन्हें कभी यूपी की राजनीति का 'चाणक्य' और मायावती का दाहिना हाथ माना जाता था।

1. बसपा का सुनहरा दौर (1984 - 2017)

नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी ने 1988 में उत्तर प्रदेश के बांदा से अपना राजनीतिक सफ़र शुरू किया और 1991 में पहली बार विधायक बनकर उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे। बसपा सरकार (ख़ासकर 2007-2012) के दौरान वह सबसे शक्तिशाली मंत्री माने जाते थे। उनके पास PWD, आबकारी और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विभाग थे, यही वजह रही कि उन्हें 'मिनी सीएम' तक कहा जाता था। 2017 के चुनाव में बसपा की हार के बाद मायावती के साथ उनके मतभेद बढ़ गए। उन पर अनुशासनहीनता और अवैध धन उगाही के आरोप लगाकर उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया।

2. कांग्रेस का दौर (2018 - 2026)

बहुजन समाज पार्टी से निकलने के बाद उन्होंने 'राष्ट्रीय बहुजन मोर्चा' बनाया, लेकिन जल्द ही उसका विलय कांग्रेस में कर दिया। कांग्रेस में उन्हें यूपी का मीडिया प्रभारी और वरिष्ठ रणनीतिकार बनाया गया। हालांकि, वह ख़ुद को कांग्रेस की कार्यप्रणाली में फ़िट महसूस नहीं कर पा रहे थे। नतीजतन जनवरी 2026 में उन्होंने कांग्रेस से यह कहते हुए इस्तीफ़ी दे दिया कि वहां उनके लिए काम की गुंज़ाइश नहीं बची है।

3. अब सपा के साथ नई पारी

अब नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी का समाजवादी पार्टी में आना अखिलेश यादव के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ख़ासतौर से पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड के मुस्लिम मतदाताओं के बीच सिद्दीक़ी की आज भी एक पहचान है। यूपी की राजनीति के जानकार मानते हैं कि नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी के आने से सपा को बड़ा सिसायी फ़ायदा मिल सकता है। सबसे बड़ी ये कि बसपा के पुराने कैडर और मुस्लिम वोट बैंक को सपा की ओर मोड़ने में आसानी हो सकती है। यक़ीनन नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी को संगठन चलाने और चुनाव प्रबंधन का लंबा अनुभव है, जिसका फ़ायदा अखिलेश यादव को 2027 के चुनाव में मिलने के आसार बढ़ गए हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति पर पैनी नज़र रखने वाले विश्लेषक मानते हैं कि अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले को एक बड़ा अल्पसंख्यक चेहरा मिल गया है जो दलित राजनीति की बारीकियों को भी क़ायसे से समझता है।


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